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ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, पृथ्वी की संरचना व अक्षांश-देशान्तर

1 min read 43 views 06 Jul 2026 World Geography
कक्षा VI-XII NCERT सार संकलन पर आधारित ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सिद्धान्त, सौरमण्डल के सभी ग्रह, पृथ्वी की आंतरिक परतें (क्रस्ट, मैंटल, कोर), गतियाँ, ग्रहण एवं अक्षांश व देशान्तर रेखाओं के विस्तृत नोट्स।
Table of Contents
  1. भाग 1: ब्रह्माण्ड एवं आकाशीय पिण्ड की संरचना
  2. 1. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्त
  3. 2. प्रमुख आकाशीय पिण्ड एवं तत्व संगठन
  4. तारों का औसत तात्विक संगठन
  5. भाग 2: सौरमण्डल — सूर्य एवं 8 ग्रहों के भौतिक गुण
  6. 1. सूर्य (Sun) एवं चन्द्रमा (Moon)
  7. 2. सौरमण्डल के 8 ग्रहों के विशिष्ट गुण
  8. सौरमण्डल के ग्रहों के महत्वपूर्ण भौतिक आँकड़े
  9. भाग 3: पृथ्वी की आकृति, आंतरिक संरचना एवं गतियाँ
  10. 1. पृथ्वी की आंतरिक परतें (Chemical Composition)
  11. भू-पर्पटी (Crust) एवं सम्पूर्ण पृथ्वी में तत्वों की मात्रा (% में)
  12. 2. पृथ्वी की गतियाँ, उपसौर व अपसौर
  13. भाग 4: अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ व अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा
  14. 1. अक्षांश रेखाएँ (Latitude Lines)
  15. 2. देशान्तर रेखाएँ (Longitude Lines) & समय गणना
  16. 3. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line) की विशेषताएँ
  17. 4. प्रमुख मानचित्र रेखाएँ
Key Points
  • रेडियो कार्बन C14 पद्धति के स्थान पर आधुनिक विचारधारा के अनुसार ब्रह्माण्ड के दो भाग हैं— वायुमण्डल और अंतरिक्ष।
  • ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का सबसे प्रामाणिक महाविस्फोटक सिद्धान्त (Big-Bang Theory) संकुचन विमोचन और निरन्तर उत्पत्ति के नियमों पर आधारित है।
  • सौरमण्डल में शुक्र सबसे गर्म और चमकीला ग्रह है, जिसके वायुमण्डल में 97% कार्बन डाई-ऑक्साइड पाई जाती है।
  • मंगल ग्रह को आयरन ऑक्साइड के कारण 'लाल ग्रह' कहा जाता है तथा यहाँ सौरमण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत निक्स ओलम्पिया स्थित है।
  • एडवर्ड स्वेस के अनुसार पृथ्वी की तीन आंतरिक परतें सियाल (सिलिका-एल्यूमीनियम), सीमा (सिलिका-मैग्नीशियम) और निफे (निकेल-फेरस) हैं।
  • पृथ्वी जब सूर्य के सबसे निकट होती है तो उसे उपसौर (3 जनवरी) तथा जब अधिकतम दूरी पर होती है तो उसे अपसौर (4 जुलाई) कहते हैं।
  • दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी हमेशा 111 किमी होती है, जबकि पृथ्वी को 1° देशान्तर घूमने में 4 मिनट का समय लगता है।
  • भारत का प्रामाणिक मानक समय 82½° पूर्वी देशान्तर रेखा से निर्धारित होता है, जिसके कारण देश के पूर्वी और पश्चिमी छोर में 2 घण्टे का समय-अंतर है।
  • 180° देशान्तर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं, जिसे साइबेरिया, बेरिंग सागर और फिजी के पास मोड़ा गया है।

भाग 1: ब्रह्माण्ड एवं आकाशीय पिण्ड की संरचना

सम्पूर्ण अंतरिक्ष (Space) और उसमें स्थित सभी प्रकार के द्रव्य व ऊर्जा ही सामूहिक रूप से ब्रह्माण्ड कहलाते हैं। आधुनिक विचारधारा के अनुसार ब्रह्माण्ड के दो भाग हैं— (1) वायुमण्डल, (2) अंतरिक्ष। ब्रह्माण्ड में लगभग एक खरब (1011) आकाशगंगाएँ (Galaxies) हैं। प्रेक्षणीय ब्रह्माण्ड का विस्तार लगभग 20 अरब प्रकाश वर्ष है और इसका कोई केन्द्र नहीं है।

1. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्त

  • गैसीय परिकल्पना (Gaseous Hypothesis) — काण्ट (यह सिद्धान्त न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम पर आधारित है)।
  • निहारिका परिकल्पना / ग्रहणु परिकल्पना — लाप्लास / चैम्बरलिन एवं मोल्टन।
  • द्वैतारक परिकल्पना / सुपरनोवा परिकल्पना — रसेल / हॉयल एवं लिटलिटन।
  • निहारिका मेघ परिकल्पना — वान वाइजसैकर।
  • महाविस्फोटक सिद्धान्त (Big-Bang Theory) — यह सिद्धान्त दो उप-सिद्धान्तों पर आधारित है:
    1. निरन्तर उत्पत्ति का सिद्धान्त — प्रतिपादक गोल्ड और हरमैन बॉण्डी।
    2. संकुचन विमोचन का सिद्धान्त — प्रतिपादक डॉ. ऐलन सैण्डेज।

2. प्रमुख आकाशीय पिण्ड एवं तत्व संगठन

  • आकाशगंगा या मंदाकिनी (Galaxy) — यह तारों का एक विशाल पुंज है। प्रत्येक आकाशगंगा में 1,00,000 मिलियन तारे हैं। हमारी पृथ्वी ऐरावत पथ (Milky Way) नामक आकाशगंगा का एक भाग है। वृहत् मैग्लेनिक मेघ, लघु मैग्लेनिक मेघ, उर्सा माइनर सिस्टम, स्कल्प्टर सिस्टम इसके अन्य उदाहरण हैं।
  • निहारिका (Nebulae) & तारामण्डल — यह अत्यधिक प्रकाशमान आकाशीय पिण्ड है, जो गैस एवं धूलकणों से मिलकर बना होता है। ओरियन निहारिका ऐरावत पथ में स्थित है। आधुनिक समय में 89 तारामण्डलों की पहचान की गई है, जिनमें हाइड्रा (Hydra) सबसे बड़ा है।
  • क्वासर्स (Quasors) & युग्म तारा — ये अत्यधिक चमकीले आकाशीय पिण्ड हैं जिनकी खोज 1962 ई. में की गई। अंतरिक्ष में जो तारे युग्मों में पाए जाते हैं उन्हें 'युग्म तारा' (Binary Star) कहा जाता है।
  • क्षुद्रग्रह (Asteroid) & धूमकेतु — ये मंगल एवं बृहस्पति ग्रह के बीच स्थित छोटे आकाशीय पिण्ड हैं जिनकी संख्या लगभग 45,000 है। फोर वेस्टा (4 Vesta) एकमात्र ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नग्न आँखों से देखा जा सकता है। धूमकेतु (Comets) धूल-कण, गैस व बर्फ से बने होते हैं; टेम्पल-1, हेलबॉप, फोर्ब्स, हेली इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

तारों का औसत तात्विक संगठन

तत्व का नाम मात्रा (प्रतिशत में)
हाइड्रोजन 70%
हीलीयम 28%
कार्बन, नाइट्रोजन तथा निऑन 1.5%
लौह वर्ग के तत्व 0.5%

भाग 2: सौरमण्डल — सूर्य एवं 8 ग्रहों के भौतिक गुण

सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाले 8 ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं तथा उल्काओं के सामूहिक रूप को सौरमण्डल कहते हैं। द्रव्यमान के अनुसार ग्रहों को पार्थिव ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) और जोवियन ग्रह (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) में बाँटा जाता है।

1. सूर्य (Sun) एवं चन्द्रमा (Moon)

  • सूर्य (Sun) — यह पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किमी. दूर स्थित एक तारा है। इसकी बाहरी सतह का तापमान 6000°C है जिसे प्रकाश-मण्डल (Photosphere) कहते हैं। इसके बाहरी भाग को क्रोमोस्फीयर तथा केंद्रीय भाग को कोर (Core) कहते हैं, जहाँ का तापमान 15 × 106 K होता है। सूर्य की ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन है। सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 8 मिनट 16.6 सेकण्ड का समय लगता है। सूर्य की उम्र 5 बिलियन वर्ष है। सूर्य के परिमण्डल में दिखने वाले काले धब्बों को 'सौर कलंक' (Sun Spot) कहते हैं।
  • चन्द्रमा (Moon) — यह पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है, जिसे जीवाश्म ग्रह भी कहा जाता है। चन्द्रमा का आकार पृथ्वी के आकार का लगभग 1/6 है। इसकी सतह का दिन का तापमान 100°C एवं रात का तापमान -180°C होता है। चन्द्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 27 दिन 7 घण्टा 43 मिनट और 11.47 सेकण्ड का समय लगता है। इसके अधिकतम 59% भाग को ही पृथ्वी की सतह से देखा जा सकता है।
  • प्लूटो (प्लूटोइड) — 24 अगस्त, 2006 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) द्वारा प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से हटाकर बौने ग्रहों की नई श्रेणी में डाल दिया गया।

2. सौरमण्डल के 8 ग्रहों के विशिष्ट गुण

  • बुध (Mercury) — यह सूर्य का सबसे निकटतम एवं सबसे छोटा ग्रह है। यहाँ वायुमण्डल नहीं है तथा इसका घनत्व 5.4 ग्राम प्रति घन सेमी. है।
  • शुक्र (Venus) — यह पृथ्वी के सबसे निकटतम, सबसे चमकीला एवं सबसे गर्म ग्रह है। इसके वायुमण्डल में 97% कार्बन डाई-ऑक्साइड पाई जाती है। इसे 'भोर का तारा' (Morning star) व 'सांझ का तारा' (Evening star) तथा पृथ्वी की बहन कहा जाता है। इसका कोई उपग्रह नहीं है।
  • पृथ्वी (Earth) — जल की अत्यधिक उपस्थिति के कारण इसे 'नीला ग्रह' कहा जाता है। यह अपने अक्ष पर 23½° झुकी हुई है।
  • मंगल (Mars) — आयरन ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण इसे लाल ग्रह (Red Planet) कहा जाता है। इसके दो उपग्रह हैं— फोबोस और डीमोस। यहाँ सौरमण्डल का सबसे ऊँचा पर्वत 'निक्स ओलम्पिया' स्थित है, जो एवरेस्ट से तीन गुना ऊँचा है।
  • बृहस्पति (Jupiter) — यह सौरमण्डल का सबसे बड़ा व भारी ग्रह है। इसके वायुमण्डल में मीथेन, अमोनिया व हाइड्रोजन गैस पाई जाती है। इसका उपग्रह गैनीमीड सौरमण्डल का सबसे बड़ा उपग्रह है।
  • शनि (Saturn) — यह आकार में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसके चारों ओर 10 स्पष्ट वलय (Rings) पाए जाते हैं। इसका घनत्व (0.68 ग्राम/घन सेमी) सबसे कम है। टाइटटन इसका सबसे बड़ा उपग्रह है।
  • अरुण (Uranus) & वरुण (Neptune) — अरुण की खोज 1781 ई. में विलियम हर्षेल ने की थी, यह अपने अक्ष पर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है। वरुण की खोज 1846 ई. में जॉन गाले ने की थी; मीथेन की अधिकता के कारण यह धुंधले हरे रंग का दिखाई देता है।

सौरमण्डल के ग्रहों के महत्वपूर्ण भौतिक आँकड़े

ग्रह का नाम उपग्रहों की संख्या सूर्य से दूरी (करोड़ किमी.) सूर्य की परिक्रमा का काल घूर्णन अवधि (अक्ष पर) सतह का माध्य ताप
बुध (Mercury) 0 5.80 88 दिन 58.6 दिन 167°C
शुक्र (Venus) 0 10.82 225.8 दिन 243 दिन 464°C
पृथ्वी (Earth) 1 14.96 365.25 दिन 23.9 घण्टे 15°C
मंगल (Mars) 2 22.80 687 दिन 24.6 घण्टे - 65°C
बृहस्पति (Jupiter) 69 77.86 11.9 वर्ष 9.9 घण्टे - 150°C
शनि (Saturn) 82 112.90 29.5 वर्ष 10.3 घण्टे - 140°C
अरुण (Uranus) 27 287.25 84 वर्ष 17.2 घण्टे - 214°C
वरुण (Neptune) 13 450.40 164.8 वर्ष 16.1 घण्टे - 218°C

भाग 3: पृथ्वी की आकृति, आंतरिक संरचना एवं गतियाँ

पृथ्वी की आकृति एक लध्वक्ष गोलाभ (Oblate Spheroid) है। इसका भू-मध्यरेखीय व्यास 12,756 किमी. तथा ध्रुवीय व्यास 12,713 किमी. है। पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। सामान्य रूप से पृथ्वी में प्रत्येक 32 मीटर की गहराई पर तापमान में 1°C की वृद्धि होती है।

1. पृथ्वी की आंतरिक परतें (Chemical Composition)

आईयूजीजी (IUGG) और एडवर्ड स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन मुख्य परतों में विभाजित किया गया है:

  1. भू-पटेल (Crust / सियाल) — यह पृथ्वी की सबसे बाहरी परत है, जो मुख्यतः ग्रेनाइट चट्टानों से बनी है। इसमें सिलिका (Si) एवं एल्यूमीनियम (Al) तत्वों की प्रधानता होती है, इसलिए इसे 'सियाल' (Sial) भी कहते हैं। इसका औसत घनत्व 2.7 है।
  2. अनुपटल (Mantle / सीमा) — भू-पटल के निचले आधार पर मोहो-असबद्धता (Moho Discontinuity) पाई जाती है, जहाँ से मैंटल परत शुरू होती है। यह परत मुख्यतः बेसाल्ट चट्टानों से निर्मित है, जिसमें सिलिका (Si) एवं मैग्नीशियम (Mg) की प्रधानता के कारण इसे 'सीमा' (Sima) कहा जाता है। इसका औसत घनत्व 3.0 है। मैंटल के ऊपरी 250 किमी. मोटे भाग को एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) कहते हैं।
  3. भू-क्रोड (Core / निफे) — मैंटल और क्रोड की सीमा को गुटेनबर्ग असबद्धता कहते हैं। इस परत में निकेल (Ni) एवं फेरस (Fe) तत्वों की प्रधानता होती है, जिसके कारण इसे 'निफे' (Nife) कहते हैं। यह परत तरल अथवा प्लास्टिक अवस्था में है और इसका आयतन पूरी पृथ्वी का 16% तथा द्रव्यमान 32% है।

भू-पर्पटी (Crust) एवं सम्पूर्ण पृथ्वी में तत्वों की मात्रा (% में)

तत्व का नाम भू-पर्पटी (Crust) में मात्रा तत्व का नाम सम्पूर्ण पृथ्वी में मात्रा
ऑक्सीजन 46.8% लोहा 35%
सिलिकन 27.7% ऑक्सीजन 30%
एल्यूमीनियम 8.1% सिलिकन 15%
लोहा 5.0% मैग्नीशियम 13%

2. पृथ्वी की गतियाँ, उपसौर व अपसौर

  • घूर्णन (दैनिक गति) — पृथ्वी का अपनी काल्पनिक धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमना घूर्णन कहलाता है। पृथ्वी एक पूरा चक्कर 23 घण्टे 56 मिनट और 4.09 सेकण्ड में लगाती है, जिससे दिन और रात होते हैं।
  • परिक्रमण (वार्षिक गति) — पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर एक निश्चित कक्षा (Orbit) में चक्कर लगाना परिक्रमण कहलाता है। इसमें पृथ्वी को 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट और 45.51 सेकण्ड का समय लगता है, जिससे ऋतु परिवर्तन होता है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है। 21 मार्च व 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत् पड़ती हैं, जिसे क्रमशः बसंत विषुव एवं शरद विषुव कहते हैं।
  • उपसौर (Perihelion) & अपसौर (Aphelion) — जब पृथ्वी सूर्य के अत्यधिक पास होती है (दूरी लगभग 147 मिलियन किमी), तो उसे 'उपसौर' कहते हैं; यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। जब पृथ्वी सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है (दूरी लगभग 152 मिलियन किमी), तो उसे 'अपसौर' कहते हैं; यह स्थिति 4 जुलाई को होती है।
  • ज्वार-भाटा व सिजिगी — सूर्य व चन्द्रमा की आकर्षक शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने को ज्वार तथा नीचे गिरने को भाटा कहते हैं। जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं तो इस स्थिति को युति-वियुति या सिजिगी (Syzygy) कहा जाता है।

भाग 4: अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ व अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा

पृथ्वी की सतह पर किसी भी बिन्दु की स्थिति को निर्धारित करने के लिए अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं का प्रयोग किया जाता है।

1. अक्षांश रेखाएँ (Latitude Lines)

  • विषुवत रेखा (0° अक्षांश रेखा) के उत्तर या दक्षिण स्थित किसी भी स्थान की कोणीय दूरी को अक्षांश कहा जाता है। अक्षांश रेखाएँ विषुवत रेखा के समानान्तर होती हैं, जो 0° से 90° उत्तर एवं दक्षिण तक खींची जाती हैं।
  • दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी लगभग 111 किमी. होती है।
  • 23½° उत्तरी अक्षांश को कर्क रेखा तथा 23½° दक्षिणी अक्षांश को मकर रेखा कहते हैं। 66½° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांश रेखा को क्रमशः आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle) एवं अंटार्कटिक वृत्त (Antarctic Circle) कहा जाता है।

2. देशान्तर रेखाएँ (Longitude Lines) & समय गणना

  • प्रधान याम्योत्तर रेखा (0° देशान्तर या ग्रीनविच रेखा) से पूर्व या पश्चिम की कोणीय दूरी को देशान्तर कहा जाता है। देशान्तर रेखाओं की कुल संख्या 360 है।
  • विषुवत रेखा पर दो देशान्तर रेखाओं के बीच की अधिकतम दूरी 111.32 किमी. होती है, जो ध्रुवों की ओर घटकर शून्य हो जाती है।
  • पृथ्वी को 360° घूमने में 24 घण्टे का समय लगता है, इस प्रकार 1° देशान्तर की दूरी तय करने में पृथ्वी को 4 मिनट का समय लगता है। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, अतः पूर्व का समय ग्रीनविच समय से आगे तथा पश्चिम का समय पीछे रहता है।
  • प्रमाणिक समय (Standard Time) — भारत का प्रमाणिक समय 82½° पूर्वी देशान्तर (इलाहाबाद) से लिया गया है। भारत के सर्वाधिक पूर्व (अरुणाचल) एवं सर्वाधिक पश्चिम (गुजरात) के स्थानीय समय में लगभग 2 घण्टे का अंतर होता है।

3. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line) की विशेषताएँ

  • 180° देशान्तर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति इस रेखा को पश्चिम से पूर्व की ओर पार करता है, तो एक दिन बढ़ जाता है एवं पूर्व से पश्चिम की ओर पार करने पर एक दिन कम हो जाता है।
  • मोड़ (Bends) — साइबेरिया को विभाजित होने से बचाने के लिए 75° उत्तरी अक्षांश पर यह रेखा पूर्व की ओर मोड़ी गई है। बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर तथा फिजी द्वीप समूह एवं न्यूजीलैंड को एक साथ रखने के लिए यह दक्षिणी प्रशान्त महासागर में पूर्व दिशा की ओर मोड़ी गई है।

4. प्रमुख मानचित्र रेखाएँ

  • हैच्यूर (Hachure) — किसी मानचित्र पर ढाल को दिखाने के लिए खींची गई असंबद्ध रेखाएँ।
  • आइसोहाइट (Isohyet) — समान वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली समरेखा।
  • समुच्च रेखा (Isohypse) — दो समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा।
  • आइसोनेफ (Isoneph) & आइसोबार (Isobar) — समान मेघाच्छादन को मिलाने वाली रेखा / समान वायुदाब को मिलाने वाली रेखा।
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