NCERT सार संकलन: गुप्तोत्तर काल, वर्द्धन वंश व हर्षवर्धन
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06 Jul 2026
Indian GK
कक्षा VI-XII NCERT सार संकलन पर आधारित गुप्तोत्तर काल (मैत्रक, मौखरी, उत्तरगुप्त वंश) तथा सम्राट हर्षवर्धन के काल, प्रशासन, अधिकारी व ह्वेनसांग के विस्तृत नोट्स।
Table of Contents
- भाग 1: गुप्तोत्तर काल — क्षेत्रीय राजवंशों का उद्भव
- भाग 2: थानेश्वर का वर्द्धन वंश (पुष्यभूति वंश)
- 1. सम्राट हर्षवर्धन (606 ई. — 647 ई.) एवं सैन्य अभियान
- 2. चीनी यात्री ह्वेनसांग का भारत आगमन
- भाग 3: वर्द्धन कालीन प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था
- 1. हर्ष के समय के महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी
- 2. प्रशासनिक व्यवस्था एवं शब्दावली
Key Points
- वल्लभी के मैत्रक वंश का संस्थापक भट्टार्क था तथा ध्रुवसेन द्वितीय के समय चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी की यात्रा की थी.
- वर्द्धन वंश (पुष्यभूति वंश) की स्थापना हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर हुई थी.
- 623 ई. में नर्मदा नदी के तट पर सम्राट हर्ष और चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के मध्य युद्ध हुआ, जिसमें हर्ष की पराजय हुई थी.
- सम्राट हर्षवर्धन ने 'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' तथा 'नागानन्द' नामक तीन प्रसिद्ध संस्कृत नाटकों की रचना की थी.
- चीनी यात्री ह्वेनसांग का प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत 'सी-यू-की' नामक चीनी ग्रंथ से प्राप्त होता है.
- हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट थे, जिन्होंने 'हर्षचरित' एवं 'कादम्बरी' जैसे सुप्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की थी.
- वर्द्धन काल में प्रांतीय शासक को 'उपरिक' या 'लोकपाल' और ग्राम प्रशासन के प्रधान को 'ग्रामाक्षपटलिक' कहा जाता था.
भाग 1: गुप्तोत्तर काल — क्षेत्रीय राजवंशों का उद्भव
गुप्त वंश के पतन के बाद अनेक क्षेत्रीय राजवंशों का उद्भव हुआ, जिनमें मैत्रक, मौखरी, पुष्यभूति (वर्द्धन), परवर्ती गुप्त और गौड़ प्रमुख थे।
- वल्लभी का मैत्रक वंश — इस वंश का संस्थापक भट्टार्क था। ध्रुवसेन द्वितीय हर्षवर्धन का समकालीन था, जिसके समय चीनी यात्री ह्वेनसांग ने वल्लभी की यात्रा की थी। ध्रुवसेन चतुर्थ ने 'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज', 'परमेश्वर' तथा 'चक्रवर्ती' की उपाधि धारण की थी। भट्टि इसका दरबारी कवि था।
- मौखरी वंश — इस वंश का संस्थापक मुखर था। ग्रहवर्मा इस वंश का अन्तिम शासक था, जिसका विवाह हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री से हुआ था।
- उत्तरगुप्त वंश — इस वंश की जानकारी के स्रोत अफसड़ तथा देववर्णार्क के अभिलेख से प्राप्त होते हैं। कृष्णगुप्त को अफसड़ अभिलेख में 'नृप' कहा गया है। जीवितगुप्त ने 'क्षितीशचूड़ामणि' की उपाधि धारण की थी। देवगुप्त का उल्लेख मधुबन तथा बाँसखेड़ा अभिलेखों में हुआ है। जीवितगुप्त द्वितीय को यशोवर्मन ने पराजित कर परवर्ती गुप्त राज्य का अंत कर दिया।
भाग 2: थानेश्वर का वर्द्धन वंश (पुष्यभूति वंश)
इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था, जिसने हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर नामक स्थान पर 'पुष्यभूति वंश' की स्थापना की थी। राज्यवर्द्धन के पश्चात् 16 वर्ष की उम्र में 606 ई. में हर्षवर्धन थानेश्वर का शासक बना।
1. सम्राट हर्षवर्धन (606 ई. — 647 ई.) एवं सैन्य अभियान
- सैन्य संघर्ष — हर्ष और चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के बीच (623 ई.) नर्मदा नदी के पास युद्ध हुआ, जिसमें हर्षवर्धन पराजित हुआ। मालवा के शासक देवगुप्त ने ग्रहवर्मा की हत्या कर दी थी और राज्यश्री को बंदी बना लिया था। हर्ष ने गौड़ शासक शशांक (जो शैव धर्म का अनुयायी था और जिसने बोधिवृक्ष को कटवा दिया था) को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
- उपाधियाँ एवं रचनाएँ — हर्ष को 'उत्तरी भारत का स्वामी' कहा जाता था। हर्ष की उपाधि 'शिलादित्य' तथा 'परमभट्टारक मगध नरेश' थी। हर्ष ने 'सुप्रभात स्रोत' और 'अष्टमहाश्रीचैत्य संस्कृत स्रोत' नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। इसके अतिरिक्त उसने 'प्रियदर्शिका', 'रत्नावली' तथा 'नागानन्द' नामक तीन प्रसिद्ध संस्कृत नाटकों की रचना की।
- धार्मिक कार्य — हर्ष के समय में कन्नौज की धर्मसभा के अतिरिक्त प्रयाग में प्रत्येक पाँचवें वर्ष एक समारोह आयोजित किया जाता था जिसे 'महामोक्षपरिषद' कहा जाता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग से मिलने के बाद हर्ष ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राज्याश्रय प्रदान किया तथा वह पूर्ण रूप से बौद्ध बन गया।
2. चीनी यात्री ह्वेनसांग का भारत आगमन
- चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में ही भारत आया था।
- ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत चीनी ग्रंथ 'सी-यू-की' से प्राप्त होता है।
- ह्वेनसांग के अनुसार गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालंदा में 80 फुट ऊँची ताँबे की बुद्ध प्रतिमा को स्थापित करवाया था।
- हर्ष के समय नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रधान केन्द्र था।
- हर्ष ने 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे तथा 643 ई. एवं 645 ई. में दो चीनी दूत उसके दरबार में आए।
- हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दंत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किए थे।
भाग 3: वर्द्धन कालीन प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था
हर्षवर्धन के शासनकाल में शासन व्यवस्था सुदृढ़ थी। हर्षचरित के रचयिता और हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' एवं 'कादम्बरी' की रचना की, जिससे तत्कालीन प्रशासन पर प्रकाश पड़ता है।
1. हर्ष के समय के महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी
| अधिकारी का पद | प्रशासनिक विभाग / मुख्य कार्य |
|---|---|
| महाबलाधिकृत | मुख्य सेनापति |
| अमात्य | मन्त्रिपरिषद् के मन्त्री |
| उपरिक | भुक्ति (प्रांत) का प्रशासक |
| दण्डपाशिक / दाण्डिक | पुलिस विभाग के अधिकारी / पुलिस अधिकारी |
| बलाधिकृत / महाबलाधिकृत | पैदल सेना के अधिकारी |
| वृहदेश्वर | अश्व सेना का अधिकारी / अधिकारी वर्ग |
| कुंतल | अश्वसेना का प्रधान अधिकारी |
| स्कन्दगुप्त | गजसेना का मुख्य अधिकारी |
| अवंति | शांति एवं युद्ध का मन्त्री |
2. प्रशासनिक व्यवस्था एवं शब्दावली
- प्रांतीय शासन — प्रशासन की सुविधा के लिए हर्ष का साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था, जिन्हें 'भुक्ति' कहा जाता था। प्रत्येक भुक्ति का शासक 'राजस्थानीय', 'उपरिक' अथवा 'राष्ट्रीय' कहलाता था। 'हर्षचरित' में प्रान्तीय शासक के लिए 'लोकपाल' शब्द आया है।
- ग्राम शासन — ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्राम प्रशासन का प्रधान 'ग्रामाक्षपटलिक' कहा जाता था।
- पुलिस व्यवस्था — साधारण पुलिस कर्मियों को 'चाट' या 'भाट' कहा गया है।
- उच्च प्रशासनिक सेवा — हर्ष के प्रमुख पदाधिकारी थे— 'कुमारामात्य' (उच्च प्रशासकीय सेवा में नियुक्त अधिकारी), 'दीर्घध्वज' (राजकीय संदेशवाहक) एवं 'सर्वगत' (गुप्तचर विभाग के सदस्य)।
- कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था — 'हर्षचरित' में सिंचाई के साधन के रूप में 'तुलायंत्र' (जलपंप) का उल्लेख मिलता है।