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राज्य कार्यपालिका: राज्यपाल व राज्य विधानमंडल नियम

1 min read 26 views 06 Jul 2026 Indian GK
राजस्थान राज्य कार्यपालिका के तहत राज्यपाल (अनुच्छेद 153-162), मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद, तथा राज्य विधानमंडल (विधान परिषद व विधानसभा) की संरचना, शक्तियों और विधायी नियमों की वर्ष 2026 के अपडेटेड डेटा सहित संपूर्ण व्याख्या।
Key Points
  • भारतीय संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका का वर्णन है.
  • राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त (अनुच्छेद 156) पद पर बना रहता है.
  • अनुच्छेद 213 राज्यपाल को विधानमंडल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति देता है.
  • विधान परिषद एक स्थायी सदन है जिसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है तथा इसके 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत होते हैं.
  • विधानसभा (अनुच्छेद 170) के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा 18 वर्ष की आयु वाले वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है.
  • किसी राज्य का धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है और विधान परिषद इसे मात्र 14 दिनों तक ही रोक सकती है.
  • राज्य का महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165) विधानमंडल की बैठकों में भाग ले सकता है, परंतु उसे मत देने का अधिकार नहीं होता है.
  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है.

राज्य कार्यपालिका (The State Executive) व राज्य सरकार

भारतीय संविधान के अनुसार केंद्र के समान राज्यों में भी संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है. राज्य सरकार का गठन भी तीन अंगों — व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से मिलकर होता है. भारत को 'राज्यों का संघ' कहा गया है, जिसमें वर्तमान में 28 राज्य तथा 8 केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं. भारत के अधिकांश राज्यों में एकसदनीय व्यवस्थापिका (केवल विधानसभा) है, जबकि 6 राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में द्विसदनीय व्यवस्थापिका अस्तित्व में है.


1. राज्यपाल (The Governor)

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जिसके द्वारा राज्य की कार्यपालिका का संचालन किया जाता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 153 प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल पद का प्रावधान करता है (एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है).

  • कार्यपालिका शक्ति (अनुच्छेद 154): राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करता है. राज्य के सभी कार्यपालिका कार्य राज्यपाल के नाम से ही संचालित होते हैं.

योग्यताएँ, नियुक्ति एवं शपथ

  • योग्यताएँ: वह भारत का नागरिक हो तथा उसकी आयु न्यूनतम 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो. वह किसी प्रकार के लाभ के पद पर न हो और राज्य विधानसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो.
  • नियुक्ति (अनुच्छेद 155): राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है.
  • पदावधि (अनुच्छेद 156): राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त (During the pleasure of the President) अपना पद धारण करता है. सामान्य तौर पर उसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है.
  • शपथ ग्रहण: राज्यपाल को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) अथवा वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है.

राज्यपाल की शक्तियाँ एवं कार्य

  1. कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य: वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है. वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General), राज्य लोक सेवा आयोग (RPSC) के अध्यक्ष व सदस्यों, राज्य वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है.
  2. विधायी शक्तियाँ: वह राज्य व्यवस्थापिका का अभिन्न अंग होता है (अनुच्छेद 168). वह विधानमंडल का सत्र आहूत, सत्रावसान और विधानसभा को भंग कर सकता है. राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कानून बनता है. अनुच्छेद 213 के तहत विधानमंडल के सत्र में न होने पर वह अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है, जो ६ सप्ताह के भीतर विधानमंडल से स्वीकृत होना आवश्यक है. वह राज्य की विधान परिषद में 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है.
  3. न्यायिक शक्तियाँ (अनुच्छेद 161): राज्यपाल को राज्य सूची के विषयों पर किसी अपराधी की सजा को क्षमा, प्रविलम्बन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है. (नोट: वह मृत्युदण्ड और सेना न्यायालय द्वारा दी गई सजा को क्षमा नहीं कर सकता).
  4. विवेकाधीन शक्तियाँ (अनुच्छेद 167(3)): जब विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो वह मुख्यमंत्री के चयन में स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है. राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर वह अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है. वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है.

2. मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद (The Chief Minister & Council of Ministers)

राज्य शासन व्यवस्था में राज्यपाल नाममात्र का प्रमुख होता है तथा वास्तविक कार्यपालिका शक्तियों का उपभोग मुख्यमंत्री ही करता है.

  • नियुक्ति (अनुच्छेद 163-164): राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है. अनुच्छेद 163(1) के अनुसार राज्यपाल को उसके कार्यों में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा.
  • मंत्रियों के प्रकार: मंत्रिपरिषद में तीन स्तर के मंत्री होते हैं — कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री. मुख्यमंत्री मंत्रियों के विभागों का वितरण करता है और मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है.
  • कार्यकाल व उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है. कोई भी व्यक्ति बिना विधानमंडल की सदस्यता के अधिकतम 6 माह तक ही मंत्री या मुख्यमंत्री रह सकता है.

3. महाधिवक्ता (The Advocate General - अनुच्छेद 165)

  • अनुच्छेद 165 के अनुसार राज्यपाल द्वारा राज्य के सर्वोच्च विधिक अधिकारी (महाधिवक्ता) की नियुक्ति की जाती है, जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता हो.
  • वह राज्य सरकार को कानूनी मामलों पर सलाह देता है. उसे राज्य विधानमंडल के सदनों की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का अधिकार है, परंतु वह मतदान नहीं कर सकता. वह राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है.

4. राज्य विधानमंडल (State Legislature)

A. विधान परिषद (Legislative Council) — उच्च सदन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत विधान परिषद के गठन और उत्सादन (समाप्ति) का प्रावधान है. यह विधानमंडल का उच्च या द्वितीय सदन होता है, जो एक स्थायी निकाय है (इसे भंग नहीं किया जा सकता, लेकिन संसद द्वारा पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है).

  • संरचना व सदस्य संख्या: विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या संबंधित राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई (1/3) से अधिक नहीं हो सकती, परंतु किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी.
  • कार्यकाल: इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है. इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुने जाते हैं.

निर्वाचन पद्धति (अनुच्छेद 171):

विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है, जिसका संघटन इस प्रकार है:

  • 1/3 सदस्य — स्थानीय निकायों (नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों आदि) द्वारा चुने जाते हैं.
  • 1/12 सदस्य — न्यूनतम 3 वर्ष पूर्व स्नातक कर चुके व्यक्तियों द्वारा चुने जाते हैं.
  • 1/12 सदस्य — न्यूनतम 3 वर्ष से माध्यमिक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ा रहे शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं.
  • 1/3 सदस्य — विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं.
  • 1/6 सदस्य — राज्यपाल द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र से मनोनीत किए जाते हैं.

B. विधानसभा (Legislative Assembly) — निम्न सदन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 170 के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक विधानसभा होगी, जिसे लोकप्रिय या प्रथम सदन कहा जाता है. इसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान पद्धति द्वारा जनता करती है.

  • सदस्य संख्या: विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 तथा न्यूनतम संख्या 60 हो सकती है. (अपवाद स्वरूप गोवा में 40, मिजोरम में 40, सिक्किम में 32 एवं पुदुचेरी में 30 सीटें हैं). नोट: राजस्थान विधानसभा में कुल सीटों की संख्या 200 है.
  • कार्यकाल: विधानसभा का सामान्य कार्यकाल प्रथम बैठक की तिथि से 5 वर्ष का होता है, परंतु राज्यपाल प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री की सलाह पर इसे समय से पूर्व भी भंग कर सकता है.
  • योग्यताएँ: वह भारत का नागरिक हो, न्यूनतम आयु 25 वर्ष पूरी कर चुका हो, दिवालिया या विकृतचित्त न हो और मतदाता सूची में उसका नाम शामिल हो.

विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) व शक्तियाँ:

  • विधानसभा के सदस्य अपने बीच में से ही एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं, जिनका कार्यकाल विधानसभा के समान होता है.
  • विधायी व वित्तीय शक्तियाँ: विधानसभा को राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है. कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय केवल विधानसभा अध्यक्ष करता है. धन विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, विधान परिषद इसे अधिकतम केवल 14 दिनों तक रोक सकती है.
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण: विधानसभा 'काम रोको प्रस्ताव', प्रश्न काल और अविश्वास प्रस्ताव पारित करके राज्य की मंत्रिपरिषद को पदच्युत कर सकती है, क्योंकि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति ही उत्तरदायी होती है.
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