पंचायती राज व 73वाँ संविधान संशोधन - सम्पूर्ण जानकारी
Table of Contents
- पंचायती राज व्यवस्था और 73वाँ संविधान संशोधन
- 73वें संशोधन के प्रमुख प्रावधान
- ग्राम सभा
- संरचना
- सदस्यों का चुनाव
- पंचायतों के चुनाव
- 73वें संशोधन के अनुसार संसद सदस्यों तथा विधानमंडल के सदस्यों के लिए प्रतिनिधित्व
- पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव तथा पदच्युति
- पंचायत समिति और जिला परिषद् के अध्यक्षों का चुनाव व पदच्युति
- आरक्षण
- चुनाव और नियत अवधि
- सदस्यों की योग्यताएँ
- वित्त आयोग
- 11वीं अनुसूची — शक्तियाँ व कार्य
Key Points
- 73वाँ संविधान संशोधन 24 अप्रैल 1993 को पारित हुआ — पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा मिला — अनुच्छेद 243 से 243(O) तक तथा 11वीं अनुसूची जोड़ी गई
- ग्राम सभा — पंचायत क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज सभी मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते हैं
- पंचायतों के चुनाव राज्य चुनाव आयोग (अनुच्छेद 243K) की देखरेख में होते हैं — आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा
- महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण अनिवार्य — राज्य सरकार ने 2009 में 50% कर दिया
- पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष — भंग होने पर 6 माह में चुनाव अनिवार्य
- सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष — वित्त आयोग प्रतिवर्ष गठित करने का प्रावधान
पंचायती राज व्यवस्था और 73वाँ संविधान संशोधन
संसद ने 24 अप्रैल, 1993 को 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित कर राज्यों को निर्देश दिया कि वे एक वर्ष में इस संशोधन के अनुसार पंचायती राज कानून बनाएँ। 17 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा उपर्युक्त निर्देशानुसार कानून बनाए गए।
इस अधिनियम के पारित हो जाने से पंचायती राज संस्थाओं को अब संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो गया है और निचले स्तर पर भी लोकतंत्र को मान्यता प्राप्त हुई है।
इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया अध्याय 9 जोड़ा गया जिसके अंतर्गत अनुच्छेद-243 से लेकर अनुच्छेद-243 (O) तक व्यवस्थाएँ की गईं और साथ ही 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गई।
73वें संशोधन के प्रमुख प्रावधान
ग्राम सभा
इस संविधान संशोधन के अनुच्छेद 243(b) के अनुसार पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले गाँव या गाँवों की मतदाता सूची में नाम दर्ज मतदाता ही ग्राम सभा के सदस्य हो सकते हैं और यही सारे सदस्य मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करेंगे। ग्राम सभा का निर्माण राज्य विधान मंडल द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार ही किया जाएगा।
संरचना
संविधान के 73वें संविधान संशोधन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक स्तर की पंचायत की रचना राज्य विधान मंडल द्वारा ही निर्धारित की जाएगी।
सदस्यों का चुनाव
73वें संविधान संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि पंचायत के सदस्यों के चुनाव के लिए पंचायत क्षेत्रों को निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा जाएगा और इन निर्वाचन क्षेत्रों में से ही पंचायत के सदस्यों की मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया जाएगा।
पंचायतों के चुनाव
- 73वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई कि पंचायतों के चुनाव राज्य चुनाव आयोग की देखरेख, नियंत्रण एवं निर्देशन में होंगे
- चुनाव आयोग पंचायती राज संस्थाओं के संबंधित अधिसूचना जारी होने के बाद चुनावों की तिथि निश्चित करता है, नामांकन पत्रों की छानबीन करता है, चुनाव चिह्न जारी करता है और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों की व्यवस्था करता है
- इसके लिए अनुच्छेद-243 K में राज्य चुनाव आयोग की व्यवस्था की गई है
- राज्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी और उसकी सेवा शर्तें एवं कार्यकाल राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित किए जाएंगे
- चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकेगा जिस प्रक्रिया द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है
73वें संशोधन के अनुसार संसद सदस्यों तथा विधानमंडल के सदस्यों के लिए प्रतिनिधित्व
- पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव क्षेत्र में आने वाले लोक सभा और राज्य विधान सभा के सदस्यों को इन संस्थाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा
- राज्य सभा और विधान परिषद् उन सदस्यों को जिनका नाम पंचायत समिति और जिला परिषद् के चुनाव क्षेत्र की मतदाता सूची में अंकित है प्रतिनिधित्व दिया जाएगा
- लेकिन संसद तथा राज्य विधान मंडलों के सदस्यों को ग्राम पंचायत में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है — इन सदस्यों को पंचायत समिति और जिला परिषद में मत देने का अधिकार दिया गया है
पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव तथा पदच्युति
- अब पंचायत के अध्यक्ष यानि सरपंच का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाएगा
- अध्यक्ष को उसका कार्यकाल पूरा होने से पूर्व भी हटाने की व्यवस्था की गई है — इसके लिए आवश्यक है कि पंचायत अपने कुल सदस्यों के बहुमत से उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से अध्यक्ष को हटाने संबंधी प्रस्ताव पास करे
- इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी जिसमें ग्राम सभा के 50% सदस्यों का उपस्थित होना अनिवार्य है
पंचायत समिति और जिला परिषद् के अध्यक्षों का चुनाव व पदच्युति
- 73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि मध्य श्रेणी पंचायतों और जिला परिषदों के अध्यक्षों का चुनाव संबंधित पंचायतों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही किया जाएगा
- यदि संबंधित पंचायत समिति के सदस्य उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत तथा कुल सदस्यों का बहुमत होना चाहिए — से अध्यक्ष को हटाने संबंधी प्रस्ताव पास कर दें तो अध्यक्ष को अपना पद त्यागना पड़ता है
आरक्षण
- अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जन-जातियाँ तथा पिछड़े वर्गों के लिए: पंचायती राज संस्थाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाएगा
- महिलाओं के लिए आरक्षण: सभी स्तर की पंचायतों के कुल स्थानों का 1/3 भाग महिलाओं के लिए आरक्षित होगा — लेकिन राज्य सरकार ने 2009 में एवं नगरीय शासन में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत स्थान आरक्षित किए हैं
- विभिन्न स्तरों की पंचायत संस्थाओं के अध्यक्षों तथा उपाध्यक्षों के कुल संख्या में भी 1/3 महिलाओं के लिए आरक्षित होगा — जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षण भी शामिल है
चुनाव और नियत अवधि
- 73वें संविधान संशोधन के अनुसार पंचायती राज की प्रत्येक संस्था का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित किया गया है
- यह कार्यकाल पंचायत की प्रथम बैठक से प्रारम्भ माना जाएगा
- पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नई पंचायत के लिए चुनाव करवाना अनिवार्य है
- यदि पंचायत को भंग कर दिया जाता है तो 6 माह के भीतर नई पंचायत के लिए चुनाव करवाना अनिवार्य है
सदस्यों की योग्यताएँ
73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं का सदस्य बनने के लिए आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है।
वित्त आयोग
पंचायती राज अधिनियम में पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय संसाधनों के हस्तांतरण तथा इसके लिए उचित कसौटियाँ सुझाने के लिए हर वर्ष एक वित्त आयोग गठित करने का भी प्रावधान है।
11वीं अनुसूची — शक्तियाँ व कार्य
73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में नई अनुसूची (11वीं अनुसूची) जोड़ी गई है जिसमें पंचायती राज व्यवस्था की शक्तियों व कार्यों का वर्णन किया गया है:
- 1. खेती बाड़ी
- 2. सिंचाई और जल प्रबंधन
- 3. भूमि सुधार
- 4. वन उत्पादन
- 5. पशुपालन, मुर्गी व डेयरी पालन
- 6. मत्स्य उद्योग
- 7. ग्रामीण आवास
- 8. सड़कों तथा पुलों के निर्माण व यातायात के साधनों का प्रबंध
- 9. तकनीकी व रोजगार शिक्षा
- 10. समाज कल्याण
- 11. कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों व जनजातियों का कल्याण आदि